प्रमाणित 2026 मेला कैलेंडर: सोरहिया मेला कुल 16 दिनों तक चलता है। वर्ष 2026 में यह शनिवार, 19 सितंबर 2026 (भाद्रपद शुक्ल अष्टमी / राधा अष्टमी) से शुरू होकर रविवार, 4 अक्टूबर 2026 (आश्विन कृष्ण अष्टमी / जीवित्पुत्रिका व्रत एवं महाउद्यापन) तक आयोजित होगा।
वाराणसी केवल गंगा घाटों और विश्वनाथ मंदिर तक ही सीमित नहीं है; काशी की आत्मा इसके प्राचीन कुंडों और मोहल्लों की जीवंत लोक परंपराओं में बसती है। गोदौलिया और सिगरा के बीच स्थित लक्सा (Luxa) का लक्ष्मी कुंड इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।
हर वर्ष शरद ऋतु के आगमन पर यहां 16 दिनों का ऐतिहासिक सोरहिया मेला लगता है। यह मेला विशेष रूप से पूर्वांचल (उत्तर प्रदेश), बिहार और झारखंड की माताओं और परिवारों की अटूट आस्था का केंद्र है। महिलाएं परिवार की सुख-समृद्धि और संतान की दीर्घायु के लिए 16 दिनों तक कठोर महालक्ष्मी व्रत का पालन करती हैं।
मेले के 16वें दिन—जो जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत का दिन होता है—यहां आस्था का जनसैलाब उमड़ पड़ता है। लाखों महिलाएं तड़के 3 बजे से ही सिंदूर से सजी बांस की डलिया (पौती), 16 बत्तियों का दीपक और पारंपरिक ठेकुआ-पिरुकिया का प्रसाद लेकर लक्ष्मी कुंड के सीढ़ियों पर पहुंचती हैं।
परंतु बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए लक्सा की संकरी सड़कें, पुलिस बैरिकेडिंग, घाट की फिसलन और पूजा सामग्री की मनमानी कीमतें बड़ी परेशानी बन जाती हैं। यह गाइड आपको जमीनी हकीकत, सही रास्ते, बुजुर्गों की सुरक्षा, वास्तविक मूल्य और प्रमाणित ट्रांसपोर्ट की पूरी जानकारी प्रदान करती है।
2026 तिथि कैलेंडर व 16 दिवसीय दैनिक पूजन नियम
'सोरहिया' शब्द की उत्पत्ति 'सोलह' (16) से हुई है। नीचे 2026 के लिए काशी पंचांग अनुसार प्रमाणित तिथियां दी गई हैं:
दिन व चरण
2026 तारीख
चंद्र तिथि
लक्ष्मी कुंड पर प्रमुख अनुष्ठान व नियम
पहला दिन (आरंभ)
शनिवार, 19 सितंबर
भाद्रपद शुक्ल अष्टमी (राधा अष्टमी)
कलश स्थापना व संकल्प: लक्ष्मी कुंड में पवित्र स्नान; 16 गांठ वाले पवित्र रक्षा-सूत्र (सोरहिया डोरा) की प्रतिष्ठा व धारण; 16 बत्ती वाले दीपक का प्रज्वलन।
दूसरा से 15वां दिन
20 सितंबर – 3 अक्टूबर
भाद्रपद नवमी से आश्विन कृष्ण सप्तमी
नित्य पूजन व परिक्रमा: प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान; महालक्ष्मी मंदिर व सोरहिया महादेव की 16 परिक्रमा; 16 दूर्वा, 16 अक्षत व 16 मौसमी फल अर्पण; सात्विक फलाहारी आहार।
15वां दिन (नहाय-खाय)
शनिवार, 3 अक्टूबर
आश्विन कृष्ण सप्तमी
जिउतिया नहाय-खाय: कुंड या गंगा में पवित्र स्नान; पारंपरिक 'नोनी का साग' और 'मडुआ की रोटी' का सेवन; निर्जला उपवास का मानसिक संकल्प।
16वां दिन (महाउद्यापन)
रविवार, 4 अक्टूबर
आश्विन कृष्ण अष्टमी (जीवित्पुत्रिका / जिउतिया व्रत)
लक्खा मेला व उद्यापन: संतान की दीर्घायु हेतु 24-36 घंटे का कठोर निर्जला व्रत; तड़के 3:00 बजे से स्नान; बांस की पौती में ठेकुआ, पिरुकिया, अंकुरित चना व खरी अर्पण; 16 गांठ वाले धागे का विसर्जन।
पारण (व्रत पूर्ण)
सोमवार, 5 अक्टूबर
आश्विन कृष्ण नवमी
सूर्योदय पश्चात कुलदेवता पूजन, भीगे चने का प्रसाद ग्रहण कर 16-दिवसीय अनुष्ठान का विधिवत समापन।
🪔 सोरहिया मेला व लक्ष्मी कुंड दर्शन — कैब व स्थानीय सहायता
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पौराणिक इतिहास: लक्ष्मी कुंड व सोरहिया महादेव
लक्ष्मी कुंड कोई साधारण तालाब नहीं, बल्कि स्कंद पुराण वर्णित एक अति प्राचीन सिद्ध शक्तिपीठ है।
1. स्कंद पुराण (काशी खंड, अध्याय 70)
काशी खंड के 70वें अध्याय में लक्ष्मी तीर्थ का विस्तार से वर्णन है। मान्यता है कि भाद्रपद मास में इस कुंड में स्नान करने से जन्म-जन्मांतर की दरिद्रता का नाश होता है और निसंतान दंपतियों को गुणवान संतान का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
प्राचीन लोक कथाओं के अनुसार, त्रेतायुग में जब भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी काशी पधारे थे, तब यहां राम कुंड, सीता कुंड और लक्ष्मण कुंड की स्थापना हुई थी। कालान्तर में लक्ष्मण कुंड महालक्ष्मी की घोर तपस्थली बना और इसे लक्ष्मी कुंड के नाम से पूजा जाने लगा।
2. गर्भगृह में दुर्लभ त्रिदेवी स्वरूप
कुंड के पूर्वी तट पर स्थित प्राचीन मंदिर का गर्भगृह अत्यंत दुर्लभ है। यहां एक साथ तीन देवियों की प्राचीन प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं:
मां महालक्ष्मी (मध्य में)
मां महासरस्वती
मां महाकाली
इस सिद्ध पीठ की रक्षा काशी की 64 योगिनियों में से एक मयूरी योगिनी और शिखी चंडी देवी करती हैं।
3. सोरहिया महादेव (महालक्ष्मीश्वर लिंगम)
मंदिर परिसर में कुंड की सीढ़ियों के ठीक समीप एक प्राचीन शिवलिंग स्थापित है। शास्त्रों में इन्हें महालक्ष्मीश्वर महादेव कहा गया है, जिनकी स्थापना स्वयं माता लक्ष्मी ने की थी। स्थानीय बनारसी जनमानस में 16 दिनों तक 16 उपचारों से पूजे जाने के कारण इन्हें श्रद्धा से सोरहिया महादेव (Sorahia Mahadev) कहा जाता है। कुंड स्नान के बाद सोरहिया महादेव का जलाभिषेक किए बिना यह व्रत अधूरा माना जाता है।
16 का आध्यात्मिक रहस्य: नियम व पूजन सामग्री
सोरहिया मेले में हर धार्मिक कृत्य 16 की संख्या से बंधा होता है:
🧵 16 गांठ का सोरहिया डोरा: कच्चे सूत को हल्दी-केसर में रंगकर 16 गांठें बांधी जाती हैं (हाथ या गले में धारण)।
🪔 16 बत्ती का दीपक: शुद्ध देसी घी या तिल के तेल का चौड़ा मिट्टी का दीया जो सीढ़ियों पर जलता है।
🧺 16 षोडशोपचार वस्तुएं: 16 दूर्वा, 16 अक्षत दाने, 16 लौंग, 16 इलायची, 16 सुपारी व 16 फल अर्पण।
सोरहिया डोरा (16 गांठ वाला रक्षा सूत्र):
कच्चे सूत के 16 तारों को मिलाकर हल्दी और केसरिया घोल में रंगा जाता है।
इसमें महालक्ष्मी के 16 स्वरूपों (धन, धान्य, धैर्य, संतान, विजय आदि) का ध्यान करते हुए 16 गांठें लगाई जाती हैं।
महिलाएं पहले दिन इसे अपनी दाहिनी कलाई या गले में धारण करती हैं, जो 16वें दिन उद्यापन तक बंधा रहता है।
16 बत्ती का दीपक:
मिट्टी के बड़े दीये में रुई की 16 अलग-अलग बत्तियां सजाई जाती हैं।
इसे शुद्ध गाय के घी या तिल के तेल से जलाकर संध्या आरती के समय कुंड तट पर दीपदान किया जाता है।
16 प्रकार की पूजन सामग्री:
प्रतिदिन स्नान के उपरांत 16 दूर्वा घास, 16 अक्षत (बिना टूटे चावल), 16 बताशे, 16 लौंग-इलायची और 16 मौसमी फल माता को समर्पित किए जाते हैं।
16वां दिन: जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) महापर्व व पौती परंपरा
मेले का अंतिम दिन लक्सा क्षेत्र को आस्था के महाकुंभ में बदल देता है।
जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) क्या है?
यह व्रत विशेष रूप से माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, निरोगी काया और संकटों से रक्षा के लिए भगवान जीमूतवाहन के निमित्त रखती हैं। यह 24 से 36 घंटे का सबसे कठिन 'निर्जला' (बिना जल का) उपवास माना जाता है।
लक्ष्मी कुंड पर 16वें दिन का दृश्य:
तड़के 3:00 बजे से 7:00 बजे तक चरम भीड़: लाखों महिलाएं लाल-पीली साड़ियों में सज-धजकर नंगे पांव लक्ष्मी कुंड पहुंचती हैं।
पारंपरिक बांस की पौती (Pauti): हर महिला के हाथ में सिंदूर से रंगी बांस की डलिया (पौती) होती है, जिसमें पारंपरिक प्रसाद भरा होता है:
शुद्ध घी और गुड़ से बना ठेकुआ और पिरुकिया (गुझिया)।
7 परतों वाली खस्ता सातापुरी।
रात भर पानी में भिगोया हुआ अंकुरित काला चना।
छोटी जंगली ककड़ी (खरी), शकरकंद और शरीफा।
मिट्टी की बनी चील्हो-सियारो की मूर्तियां (जो जिउतिया कथा की साक्षी मानी जाती हैं)।
विसर्जन व डोरा खोलना: कुंड में स्नान कर माताएं सूर्यदेव को अर्घ्य देती हैं, कथा सुनती हैं, 16 गांठ वाले डोरे को खोलकर कुंड में विसर्जित करती हैं और पौती का प्रसाद अपनी संतानों के लिए घर ले जाती हैं।
जमीनी हकीकत: लक्सा ट्रैफिक व वाहन कहां तक जा सकते हैं?
अक्सर बाहर से आने वाले श्रद्धालु यह मान लेते हैं कि उनकी टैक्सी या ऑटो सीधे मंदिर के गेट तक पहुंच जाएगा। लक्सा की भौगोलिक स्थिति को समझना अत्यंत आवश्यक है:
लक्सा रोड का ट्रैफिक नियम
मेले के दौरान वाराणसी ट्रैफिक पुलिस लक्सा मार्ग को वाहनों के लिए पूरी तरह बंद कर देती है:
गुरुबाग से गोदौलिया (गिरिजाघर) के बीच चार पहिया और ऑटो का प्रवेश सुबह 4:00 से 11:00 और शाम 4:00 से 10:00 बजे तक पूर्णतः प्रतिबंधित रहता है।
16वें दिन (जिउतिया) पर यह मार्ग पूर्णतः पैदल जोन घोषित कर दिया जाता है।
पश्चिमी छोर (गुरुबाग चौराहा बैरिकेड): सिगरा / रथयात्रा मार्ग से अंतिम वाहन ड्रॉप पॉइंट (450 मीटर पैदल मार्ग - बाजार के बीच से मंदिर)।
पूर्वी छोर (गिरिजाघर चौराहा बैरिकेड): गोदौलia / दशाश्वमेध मार्ग से अंतिम वाहन ड्रॉप पॉइंट (550 मीटर पैदल मार्ग - लक्सा मुख्य मार्ग से मंदिर)।
गाड़ियों के लिए 2 सबसे सुरक्षित ड्रॉप पॉइंट्स
गुरुबाग चौराहा (सबसे उत्तम विकल्प):
सिगरा, रथयात्रा या कैंट रेलवे स्टेशन की ओर से आने पर बिना किसी जाम के गाड़ियां गुरुबाग तक आसानी से पहुंच जाती हैं।
यहां गाड़ी से उतरकर लक्सा रोड पर पूर्व दिशा में मात्र 450 मीटर (लगभग 5 से 7 मिनट) सीधा चलकर आप सीधे लक्ष्मी कुंड पहुंच सकते हैं।
गिरिजाघर चौराहा (गोदौलिया छोर):
यदि आप दशाश्वमेध या अस्सी के पास ठहरे हैं, तो सेंट थॉमस चर्च (गिरिजाघर चौराहा) तक वाहन जा सकते हैं।
यहां से पश्चिम की ओर 550 मीटर (लगभग 8 से 10 मिनट) पैदल चलना होता है।
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बुजुर्गों की सुरक्षा व कुंड स्नान के व्यावहारिक निर्देश
यदि आपके साथ परिवार के वरिष्ठ सदस्य या माताएं हैं, तो इन स्थानीय बातों का विशेष ध्यान रखें:
सीढ़ियों पर फिसलन से बचाव:
कुंड की प्राचीन पत्थर की सीढ़ियों पर लगातार स्नान, चढ़ाए गए दूध, तेल के दीयों और सिंदूर के कारण चिकनाहट जम जाती है।
सुझाव: रबर की मजबूत ग्रिप वाले जूते-चप्पल पहनें। चमड़े की चप्पल बिल्कुल न पहनें। नगर निगम द्वारा बिछाई गई जूट की चटाइयों पर ही पैर रखें।
दुर्बल बुजुर्गों के लिए 'मार्जन' का विकल्प:
शास्त्रों के अनुसार, यदि कोई वृद्ध या अस्वस्थ व्यक्ति सीढ़ियों से नीचे उतरने में असमर्थ है, तो उसे गहरे पानी में उतरने की आवश्यकता नहीं है। सबसे ऊपरी सुरक्षित सीढ़ी पर बैठकर हाथ-पैर धोकर कुंड का पवित्र जल सिर पर छिड़कना (मार्जन) ही पूर्ण स्नान के समान फलदायी माना गया है।
महिलाओं के लिए अलग स्नान घेरा:
उत्तरी घाट की ओर प्रशासन द्वारा लोहे के बैरिकेड और पर्दों से सुरक्षित महिला स्नान व वस्त्र बदलने का घेरा बनाया जाता है।
जिउतिया के दिन सुबह की भगदड़ से बचें:
16वें दिन सुबह 4 से 7 बजे तक अत्यधिक भीड़ रहती है। यदि साथ में बुजुर्ग हैं, तो सुबह 8:30 से 10:30 बजे के बीच दर्शन करें जब भीड़ काफी छंट जाती है।
वास्तविक मूल्य तालिका: ठगी व बिचौलियों से सावधान रहें
मेले के समय सड़क किनारे कुछ विक्रेता अनजान तीर्थयात्रियों से मनमाना दाम वसूलते हैं। सही दरों की जानकारी नीचे दी गई है:
सामग्री / सेवा
वास्तविक स्थानीय मूल्य
मनमानी मांग (सावधान रहें)
जमीनी सच्चाई
सोरहिया डोरा (16 गांठ का धागा)
₹10 – ₹20
₹100 – ₹200
यह हल्दी रंगा साधारण सूती धागा है। गुरुबाग की स्थाई दुकानों पर सरलता से उपलब्ध।
सामान्य पूजा की थाली (फूल, बेलपत्र, दूर्वा, सिंदूर)
₹50 – ₹100
₹250 – ₹500
चलते-फिरते ठेले वालों के बजाय लक्सा रोड की पक्की दुकानों से लें।
16 बत्ती का मिट्टी का दीया
₹20 – ₹30
₹80 – ₹100
स्थानीय कुम्हारों द्वारा निर्मित साधारण मिट्टी का पात्र।
बांस की पौती (जिउतिया हेतु डलिया)
₹80 – ₹150
₹350 – ₹500
16वें दिन की सुबह दाम बढ़ जाते हैं; दालमंडी या गुरुबाग से 2 दिन पूर्व खरीद लें।
पुरोहित संकल्प / उद्यापन दक्षिणा
₹101 – ₹251 (ऐच्छिक)
₹1,100 – ₹2,100
संकल्प में केवल 5 मिनट लगते हैं। दक्षिणा श्रद्धा अनुसार दें, किसी के दबाव में न आएं।
साइकिल-रिक्शा (बैरिकेड तक)
₹30 – ₹50
₹150 – ₹200
रथयात्रा या गोदौलिया से गुरुबाग बैरिकेड तक चलने में असमर्थ बुजुर्गों हेतु।
मेले के दौरान कहां ठहरें (और कहां रुकने से बचें)
होटल के गलत चयन से आपको भारी सामान उठाकर भीड़भाड़ वाली गलियों में पैदल चलना पड़ सकता है:
❌ गोदौलिया या दशाश्वमेध की संकरी गलियों में होटल न लें:
मेले और वीआईपी ट्रैफिक के कारण रास्ते बंद रहते हैं, जिससे सामान लेकर 1 से 1.5 किमी तक पैदल घसीटना पड़ता है।
7. होटल व धर्मशाला चयन मार्गदर्शिका
ठहरने का क्षेत्र
लक्ष्मी कुंड से दूरी
किसके लिए उपयुक्त
प्रमुख लाभ
सिगरा / रथयात्रा
1.0 – 1.8 किमी
परिवार एवं बुजुर्ग
चौड़ी सड़कें, कैब की आसान उपलब्धता, शांत परिवेश
कैंटोनमेंट (कैंट)
3.5 – 4.5 किमी
प्रीमियम / व्यावसायिक यात्री
4-सितारा व 5-सितारा होटल, उच्च स्तरीय भोजन
गोदौलिया / लक्सा
0.4 – 0.8 किमी
पारंपरिक दर्शनार्थी
पैदल दूरी, परंतु संकरी गलियां व वाहनों का प्रतिबंध
अस्सी घाट क्षेत्र
2.5 – 3.2 किमी
शांतिप्रिय यात्री व विदेशी
शांत घाट, योग केंद्र व अच्छे कैफे
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8. फिक्स्ड-किराया मेला कैब व टेम्पो ट्रैवलर सेवाएं
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₹1,199
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
क्या सोरहिया मेले में पुरुष भी लक्ष्मी कुंड में स्नान कर सकते हैं?
जी हां। यद्यपि अधिकांश श्रद्धालु महिलाएं होती हैं जो महालक्ष्मी और जिउतिया का व्रत रखती हैं, पुरुष और युवा भी कुंड में आस्था की डुबकी लगाते हैं और सोरहिया महादेव पर जल चढ़ाते हैं। पुरुषों और महिलाओं के स्नान हेतु अलग-अलग सीढ़ियां निर्धारित हैं।
क्या लक्ष्मी कुंड परिसर में फोटोग्राफी की अनुमति है?
बाहरी कुंड की सीढ़ियों और मेले की सामान्य फोटोग्राफी की अनुमति है। परंतु मंदिर के गर्भगृह में माता की मूर्तियों की फोटो खींचना पूर्णतः वर्जित है। इसके अतिरिक्त घाट पर स्नान कर रही महिलाओं की निजता का सदैव सम्मान करें।
लक्सा के पास शुद्ध फलाहारी भोजन कहां उपलब्ध होता है?
सिगरा-रथयात्रा मार्ग पर स्थित प्रतिष्ठित मिष्ठान प्रतिष्ठानों (जैसे क्षीर सागर, राम भंडार) में शुद्ध सेंधा नमक में तैयार साबूदाना खिचड़ी, सिंघाड़े की पूरी, मखाना खीर और ताजे फलों की थाली स्वच्छता के साथ मिलती है।
क्या लक्ष्मी कुंड और काशी विश्वनाथ दर्शन एक साथ संभव है?
बिल्कुल। हमारे 8 घंटे / 80 किमी पैकेज के तहत सुबह 5:00 बजे चालक आपको गुरुबाग छोड़ता है, स्नान व अल्पाहार के बाद सुबह 8:30 बजे भारी भीड़ होने से पहले आपकी गाड़ी आपको विश्वनाथ कॉरिडोर के गेट नंबर 4 (मैदागिन) पहुंचा देती है।
विश्वास के साथ अपनी लक्ष्मी कुंड यात्रा की योजना बनाएं
मेले की भीड़ या रास्ते के असमंजस में अपनी भक्ति को बाधित न होने दें। चाहे आपको तड़के 4 बजे होटल पर गाड़ी चाहिए, बिहार से आ रहे संयुक्त परिवार के लिए 17-सीटर टेम्पो ट्रैवलर चाहिए, या सिगरा में स्वच्छ होटल चाहिए—हमारा स्थानीय वाराणसी कार्यालय आपकी सेवा में तत्पर है।